खाना खाने के बाद ब्लड शुगर बढ़ना हमेशा ख़राब क्यों नहीं होता?

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खाना खाने के बाद ब्लड शुगर बढ़ना हमेशा ख़राब क्यों नहीं होता?

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आजकल ब्लड शुगर बढ़ने की बहुत बात होती है. लेकिन खाना खाने के बाद ब्लड शुगर का बढ़ना शरीर का एक आम और स्वाभाविक काम भी हो सकता है.

तो क्या आप जानते हैं कि इस पर कब चिंता करनी चाहिए और कब नहीं?

पिछले कुछ सालों में दो चौंकाने वाले बदलाव देखे गए हैं.

पहला, कई स्वस्थ लोग भी अब दिनभर ब्लड शुगर मापने वाली मशीन पहनने लगे हैं, जबकि उन्हें डायबिटीज़ या ऐसी कोई बीमारी नहीं है. वहीं कुछ लोगों ने सफ़ेद ब्रेड और पास्ता जैसे रिफ़ाइंड कार्बोहाइड्रेट खाना बिल्कुल छोड़ दिया है.

खाना खाने के बाद ब्लड शुगर बढ़ना हमेशा ख़राब क्यों नहीं होता?

जब हम चीनी, फल या कार्बोहाइड्रेट वाली कोई चीज़ खाते हैं, तो उसे पचाते समय हमारा ब्लड शुगर अपने आप थोड़ा बढ़ जाता है.

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पचते समय कार्बोहाइड्रेट और चीनी टूटकर ग्लूकोज़ बन जाते हैं.

यह ग्लूकोज़ ख़ून में मिल जाता है, जिससे थोड़ी देर के लिए ब्लड शुगर बढ़ जाता है.

तब अग्नाशय (पैंक्रियाज़) इंसुलिन नाम का हार्मोन छोड़ता है.

इंसुलिन ग्लूकोज़ को ख़ून से निकालकर शरीर की कोशिकाओं तक ले जाता है. वहां कोशिकाएं इस ग्लूकोज़ से ऊर्जा बनाती हैं.

अमेरिका के कनेक्टिकट में येल स्कूल ऑफ़ मेडिसिन की डॉक्टर जेनिफ़र शेर बच्चों में हार्मोन से जुड़ी बीमारियों की विशेषज्ञ हैं. वह बताती हैं कि जब हम बहुत तेज़ कसरत करते हैं, तो शरीर में एड्रेनलिन जैसे हार्मोन बनते हैं. ये हार्मोन लिवर से कहते हैं कि वह ख़ून में ज़्यादा ग्लूकोज़ (शुगर) छोड़े.

यह ज़्यादा ग्लूकोज़ कसरत कर रही मांसपेशियों को ज़्यादा ताक़त देता है. इसी वजह से थोड़ी देर के लिए ब्लड शुगर बढ़ सकता है.

डायबिटीज़ वाले लोगों के साथ दो में से एक दिक़्क़त होती है. या तो उनका शरीर पूरा इंसुलिन नहीं बना पाता, या फिर इंसुलिन बनता तो है लेकिन ठीक से काम नहीं करता. इस दूसरी स्थिति को इंसुलिन रेज़िस्टेंस कहते हैं.

इसलिए खाना खाने के बाद उनका ब्लड शुगर ख़तरनाक हद तक बढ़ सकता है.

ऐसे लोगों को अपने खाने-पीने और कसरत का ध्यान रखना चाहिए. उन्हें अपना ब्लड शुगर भी बार-बार जांचते रहना चाहिए, ताकि वह अचानक न बढ़े.

कुछ लोगों को इंसुलिन या मेटफ़ॉर्मिन जैसी दवाएं भी लेनी पड़ती हैं.

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ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में पोषण और खानपान के एसोसिएट प्रोफ़ेसर एड्रियन ब्राउन कहते हैं, “सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी ये मानना है कि ब्लड शुगर का हर बार बढ़ना नुक़सानदेह होता है.”

हाल ही में मैंने छह हफ़्ते तक ऐसी चीनी खाना छोड़ दिया था, जो खाने-पीने की चीज़ों में ऊपर से मिलाई जाती है. तब से मैं ये बात ज़्यादा समझने लगी हूं कि जब भी मैं कुछ मीठा खाती हूं, तो मेरा ब्लड शुगर बढ़ना स्वाभाविक है.

आमतौर पर खाना खाने के लगभग एक घंटे बाद ब्लड शुगर सबसे ऊपर पहुंचता है.

इसके बाद अगले दो घंटों में यह फिर से सामान्य हो जाता है.

ब्राउन कहते हैं कि अगर ब्लड शुगर थोड़ी देर के लिए बढ़ता है, और व्यक्ति का शरीर खाना पचाकर उसे ठीक से ऊर्जा में बदल रहा है, तो चिंता की कोई बात नहीं है.

जेनिफ़र शेर कहती हैं कि चिंता तब करनी चाहिए, जब ब्लड शुगर उम्मीद से ज़्यादा देर तक बढ़ा रहे.

इसका मतलब हो सकता है कि शरीर ग्लूकोज़ को ठीक से संभाल नहीं पा रहा है.

यह इंसुलिन रेज़िस्टेंस का संकेत भी हो सकता है. इसमें शरीर इंसुलिन पर वैसा असर नहीं दिखाता, जैसा उसे दिखाना चाहिए.

अगर शरीर में लंबे समय तक ब्लड शुगर बढ़ा रहे, तो इंसुलिन रेज़िस्टेंस हो सकता है.

आगे चलकर इससे प्री-डायबिटीज़ और टाइप-2 डायबिटीज़ हो सकती है.

डायबिटीज़ वाले कुछ लोगों में अगर ब्लड शुगर लगातार बढ़ा रहे, तो इससे नसों और आंखों को नुक़सान हो सकता है.

इससे दिल की बीमारी और स्ट्रोक का ख़तरा भी बढ़ सकता है.

हालांकि, कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि अभी इस बात के पूरे सबूत नहीं हैं कि बहुत ज़्यादा ब्लड शुगर से सीधे इंसुलिन रेज़िस्टेंस होता है.

ब्रिटेन की ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में आहार विशेषज्ञ और सीनियर रिसर्च फ़ेलो निकोला गेस इसकी एक और वजह बताती हैं.

वह कहती हैं कि जब हम शरीर की ज़रूरत से ज़्यादा खाते हैं, तो बची हुई कैलोरी अक्सर चर्बी बनकर शरीर में जमा होने लगती है.

इससे वज़न बढ़ता है, और बढ़ा हुआ वज़न टाइप-2 डायबिटीज़ का ख़तरा बढ़ाता है.

डायबिटीज़ वाले लोग पहले से ही अपना ब्लड शुगर बार-बार चेक करते हैं.

इसका एक तरीक़ा है कंटीन्यूअस ग्लूकोज़ मॉनिटर, यानी सीजीएम. यह मशीन पूरे दिन ब्लड शुगर मापती रहती है.

अब ये मशीनें ऐसे स्वस्थ लोगों को भी बेची जा रही हैं, जिन्हें डायबिटीज़ नहीं है. ऐसे लोगों में इनकी बिक्री लगातार बढ़ रही है.

लेकिन कुछ विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि जिन लोगों को डायबिटीज़ नहीं है, उन्हें इन मशीनों की ज़रूरत नहीं है.

जैसे, बिना डायबिटीज़ वाले लोगों पर हुए एक अध्ययन में पाया गया कि 96 फ़ीसदी समय उनका ब्लड शुगर सही स्तर पर था.

कुछ विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि इन मशीनों की वजह से लोग अपने खाने में ऐसे बदलाव कर सकते हैं, जो उनके लिए नुक़सानदेह हों.

इससे लोग अपनी सेहत को लेकर ग़लत सोच भी बना सकते हैं.

इसकी एक वजह यह है कि ये मशीनें कभी-कभी ब्लड शुगर को असल से ज़्यादा दिखा सकती हैं.

एड्रियन ब्राउन और उनके साथियों ने हाल ही में इस विषय पर हुए अध्ययनों को जांचा.

उन्हें ऐसे पक्के और भरोसेमंद सबूत नहीं मिले, जिनसे पता चले कि सीजीएम (कंटीन्यूअस ग्लूकोज़ मॉनिटर) इस्तेमाल करने से बिना डायबिटीज़ वाले लोगों की सेहत बेहतर होती है.

हालांकि, जिन लोगों को टाइप-2 डायबिटीज़ होने का ख़तरा है, उनके लिए बात अलग हो सकती है.

जेनिफ़र शेर कहती हैं कि शुरुआती रिसर्च से लगता है कि ये मशीनें यह पहचानने में मदद कर सकती हैं कि किन लोगों को टाइप-2 डायबिटीज़ का ख़तरा ज़्यादा है.

लेकिन ऐसे लोगों के लिए सीजीएम सच में फ़ायदेमंद है या नहीं, यह जानने के लिए अभी और सबूत चाहिए.

संतुलित खाना अब भी सबसे अच्छा रास्ता

स्वस्थ लोगों में ब्लड शुगर का बढ़ना आम बात है, और इससे गंभीर नुक़सान होने का डर कम होता है.

फिर भी ब्लड शुगर को बहुत तेज़ी से ऊपर-नीचे होने से बचाने के कुछ फ़ायदे हो सकते हैं.

जैसे, खाना खाने के बाद अगर ब्लड शुगर तेज़ी से गिरता है, तो ज़्यादा भूख लग सकती है.

इससे हम दिनभर में ज़्यादा खा सकते हैं और शरीर में ज़्यादा कैलोरी पहुंच सकती है.

अलग-अलग खाने का ब्लड शुगर पर अलग असर होता है.

जो चीज़ें ब्लड शुगर को एक जैसा बनाए रखती हैं, उन्हें खाने से पेट देर तक भरा लगता है.

इनमें साबुत अनाज और प्रोटीन वाली चीज़ें आती हैं.

वहीं सफ़ेद ब्रेड और सफ़ेद चावल जैसे साधारण कार्बोहाइड्रेट जल्दी पच जाते हैं, और इनसे बना ग्लूकोज़ तेज़ी से ख़ून में पहुंचता है.

आप खाने की चीज़ें किस क्रम में खाते हैं, इससे भी फ़र्क़ पड़ता है.

अध्ययनों में पाया गया है कि अगर कार्बोहाइड्रेट से पहले प्रोटीन और सब्ज़ियां खाई जाएं, तो बाद में ब्लड शुगर उतना नहीं बढ़ता जितना आमतौर पर बढ़ता है.

एक और तरीक़ा यह है कि खाने में प्रोटीन, ज़्यादा फ़ाइबर वाली पौधों से मिलने वाली चीज़ें और सेहतमंद वसा (फ़ैट) शामिल हों.

ऐसा संतुलित खाना धीरे-धीरे पचता है और शरीर को लगातार ऊर्जा देता रहता है.

इससे वज़न को सही बनाए रखने में भी मदद मिलती है.

यह भी याद रखना चाहिए कि एक ही खाना अलग-अलग लोगों पर अलग असर डाल सकता है.

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1. यह शरीर की प्राकृतिक ऊर्जा प्रक्रिया है
जब हम कार्बोहाइड्रेट, फल या स्टार्च वाली चीजें खाते हैं, तो हमारा पाचन तंत्र उन्हें तोड़कर ग्लूकोज (चीनी) में बदल देता है। यह ग्लूकोज हमारे खून में शामिल होता है, जिससे ब्लड शुगर का स्तर अस्थायी रूप से बढ़ जाता है। यह बढ़ा हुआ ग्लूकोज ही हमारे मस्तिष्क, मांसपेशियों और अन्य अंगों को काम करने की ऊर्जा देता है।
ब्लड शुगर बढ़ते ही हमारा अग्न्याशय (Pancreas) इंसुलिन नाम का हार्मोन रिलीज करता है। इंसुलिन एक चाबी की तरह काम करता है, जो खून में मौजूद ग्लूकोज को शरीर की कोशिकाओं (Cells) के अंदर भेजता है ताकि वहां ऊर्जा बनाई जा सके। स्वस्थ लोगों में यह प्रक्रिया इतनी सटीक होती है कि खाना खाने के 2-3 घंटे के भीतर ब्लड शुगर अपने आप वापस सामान्य स्तर पर आ जाता है।
3. सामान्य और नुकसानदेह बढ़त में अंतर
  • स्वस्थ वयस्कों के लिए: भोजन शुरू करने के 1 से 2 घंटे बाद ब्लड शुगर का स्तर 140 mg/dL से कम रहना पूरी तरह सामान्य माना जाता है। 
  • चिंता की बात कब होती है? खराबी तब मानी जाती है जब भोजन के बाद शुगर का स्तर लगातार 180 mg/dL से ऊपर बना रहे या शरीर इंसुलिन का सही इस्तेमाल न कर पाए (जिसे इंसुलिन रेजिस्टेंस कहते हैं)। 
शुगर के उतार-चढ़ाव को संतुलित रखने के आसान तरीके
भले ही खाने के बाद शुगर बढ़ना सामान्य है, लेकिन अगर यह बहुत तेजी से ऊपर-नीचे होता है, तो बार-बार भूख लगना और थकान जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसे स्थिर रखने के लिए: 
  • खाने का सही क्रम: कार्बोहाइड्रेट (जैसे रोटी, चावल) खाने से पहले फाइबर (सलाद/सब्जियां) और प्रोटीन (दाल, पनीर या अंडा) खाएं। इससे ग्लूकोज खून में धीरे-धीरे घुलता है।

  • जटिल कार्बोहाइड्रेट चुनें: सफेद चावल या मैदा की जगह साबुत अनाज, ओट्स और फाइबर युक्त चीजें खाएं।

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